Swift ने सफलता पूर्वक ‘Moose Test’ किया [वीडियो]

‘Moose Test’ वाहन की स्थिरता, पकड़ और दिशा बदलने वाले कौशल की जांच करने का एक तरीका है. मूस परीक्षण Sweden में तैयार किया गया था, और इसमें एक मूस (एक बड़ा हिरण) अचानक हाईवे पर कूदता है और एक कार चालक को अपनी को इस से बचाना होता है. ये परीक्षण खरीदारों को आपातकालीन परिस्थितियों में कार की स्थिरता को समझने में मदद करने के लिए है. यहां ऑल न्यू Suzuki Swift एक मूस टेस्ट और एक परीक्षण ट्रैक पर एक slalom परीक्षण कर रही है.

आईये देखें यहाँ हुआ क्या ?

वीडियो में दिखाई गई ऑल नई Swift पहले एक मूस परीक्षण में हिस्सा लेती है. ट्रैफिक कोन्स इस तरह से रखे जाते हैं कि यह एक आपात स्थिति बनाते हैं और कार को बाईं ओर घूमना पड़ता है और फिर तेज़ स्पीड में ट्रैक पर वापस आ जाती है. पूरा मूस परीक्षण 60 मीटर की दूरी पर स्थापित किया गया है.

इस वीडियो में Swift को पहले टेस्ट के लिए 77 किलोमीटर/घंटे की रफ़्तार से चलाई जाती है, जो काफी तेज़ रफ़्तार है और भारतीय हाईवेज़ के लिए नियमित गति है. बिना किसी समस्या के Swift को इस टेस्ट का पहला पड़ाव पार करते देखा जा सकता है. हालांकि, ये हैचबैक दूसरे मोड़ में अंडरस्टेर का सामना करती है. वीडियो अनुसार थोड़े फर्म सस्पेंशन सेट-अप बॉडी रोल को सामान्य रखता है जो बदले में इस तरह के हाई-स्पीड मनोयुवर्स के दौरान अधिक स्थिरता प्रदान करता है.

80 किमी / घंटा की थोड़ी अधिक गति पर, इस हैचबैक में बड़े अंडरस्टेर का सामना करना पड़ता है और ये आसपास के कुछ कोन्स को गिरा देती है और तीसरे कोनेरिंग के लिए इसे पर्याप्त तरीके से स्टेबल नहीं किया जा पाता है. यह दिखाता है कि गति में मामूली बदलाव के साथ वाहन की गतिशीलता कैसे बदल सकती है.

वीडियो में स्लैलम परीक्षण भी देखा जा सकता है. स्लैलम परीक्षण से पता चलता है कि ग्रिप छोड़े बिना वाहन कितनी जल्दी दिशा बदल सकती है. वीडियो ये भी दिखाता है कि कार तेजी से दिशा परिवर्तन के दौरान किसी भी अंडरस्टेर का अनुभव करती है या नहीं। वीडियो में Swift सफलता पूर्वक स्लैलम परीक्षण पूरा कर लेती है. Electronic Stability Control (ESC) कार को इस परीक्षण में फिसलने से रोकता है. यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए कि Swift के भारतीय वर्शन में ESC, ऑप्शन के तौर पर भी उप्लब्ध नहीं है.

रफ़्तार खतरनाक साबित हो सकती है

वाहन की स्थिरता के अलावा, वीडियो स्पीड से उत्पन्न होने वाले खतरों को हाइलाइट करता है. केवल 3 किमी / घंटा का अंतर कार से स्टीयरिंग फीडबैक पर प्रतिक्रिया करने के तरीके को बदल सकता है और इससे आपदाजनक दुर्घटना हो सकती है. तेज़ रफ़्तार किसी भी वाहन के लिए खतरनाक हो सकती है, वाहन को आपात स्थिति में मोड़ने में मुश्किल हो सकती है. गति सीमा के भीतर ड्राइव करना हमेशा महत्वपूर्ण होता है, खासतौर पर भारतीय सड़कों पर जहां बहुत ही आश्चर्यजनक आश्चर्य होते हैं.

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