सेकंड हैण्ड कार्स खरीदने से पहले कैसे पता करें की आपके ओडोमीटर से छेड़-छाड़ हुई है या नहीं?

इंडिया में इस्तेमाल की हुई कार्स खरीदते हुए सबसे बड़ा रिस्क जो होता है वो छेड़-छाड़ वाले ओडोमीटर्स का होता है, जहां कार कितना चली है उस आंकड़े को घटा कर दिखाया जाता है. इस दिक्कत से कैसे निपटें? कई लोगों ने सेकंड हैण्ड कार्स खरीदी हैं जिनके ओडोमीटर पर मात्र 60,000 किलोमीटर डिस्प्ले हो रहा है, पर कुछ ही दिनों के बाद उन्हें पता चलता है की कार असल में ज़्यादा डोर तक चली हुई है. ये बातें आमतौर पर कार के किसी सर्विस स्टीकर या अधिकृत सर्विस सेण्टर से पता चलती हैं.

इंडिया में सेकंड हैण्ड कार्स खरीदने से पहले आपको ओडोमीटर से छेड़-छाड़ ज़रूर चेक कर लेनी चाहिए. ये सिरदर्दी का काम हो सकता है लेकिन एक अच्छी डील पाने के लिए आपको ये करना ही पड़ेगा. कभी कभी पुराने ओनर एक असल दिक्कत के चलते इंस्ट्रूमेंट कंसोल बदल देते हैं जिससे ये प्रॉब्लम पकड़ना और मुश्किल हो जाता है.

एनालॉग मीटर से छेड़-छाड़

पहले की कार्स में एनालॉग मीटर हुआ करते थे जिसमें छोटे-छोटे चक्के घूम कर नम्बर दिखाते थे. इसे इससे की हुई छेड़-छाड़ पकड़ना बेहद आसान होता है. कार के स्पीडोमीटर या इंस्ट्रूमेंट कंसोल हटाया हुआ होता था और कुछ डिजिट (खासकर 1,00,000 या 10,000 वाले व्हील्स) पीछे घुमाए हुए होते थे. कम चली हुई दूरी का मतलब था ‘कम’ इस्तेमाल की हुई कार्स की कीमत अच्छी मिलती है.

इस तरह की ओडोमीटर छेड़-छाड़ अक्सर अच्छे से नहीं की हुई होती है और ओडोमीटर में डिजिट अच्छे से अलाइन नहीं होते. अक्सर इस तरह की छेड़-छाड़ तुरंत पकड़ नहीं आती है लेकिन जब गाड़ी 10,000 किलोमीटर चल जाती है डिजिट एक जगह नहीं आते.

डिजिटल ओडोमीटर से छेड़-छाड़

अधिकांश मॉडर्न कार्स में डिजिटल ओडोमीटर होते हैं जिनके बारे में पहले धारणा हुआ करती थी की उनसे छेड़-छाड़ करना मुश्किल होता है. लेकिन दुर्भाग्य की बात है की ये अब सच नहीं है और छेड़-छाड़ किये हुए डिजिटल ओडोमीटर इलेक्ट्रॉनिक होने के चलते कोई सुराग नहीं छोड़ते. ऐसे कई ‘मीटर रिपेयर’ दुकानें हैं जो ऐसा करती हैं. कार का कंसोल निकाला जाता है और मनचाही दूरी को चिप में फ़्लैश कर दिया जाता है. कभी कभी चिप को रिप्लेस भी किया जाता है. कुछ सुराग होते हैं जैसे, बुरे फिटिंग वाला स्पीडोमीटर कंसोल, उँगलियों के निशाँ वाला ग्लास, या प्लास्टिक के पीछे उँगलियों के निशान, और अन्दर के स्क्रू पर स्क्रूड्राइवर के चिन्ह, लेकिन इन्हें पहचान पाना बेहद मुश्किल होता है.

कभी कभी कार डीलर्स गाड़ी से स्पीडोमीटर का तार निकाल देते हैं, (आजकल कई गाड़ियों में इलेक्ट्रो-मैकेनिकल स्पीडोमीटर होते हैं जो ट्रांसमिशन से रीडिंग लेते हैं क्योंकि कुछ डाटा कार के ECU को भी चाहिए होता है). वो किसी और को कार बेचने तक स्पीडोमीटर से गाड़ी को डिसकनेक्ट कर चलाते हैं.

ओडोमीटर से छेड़-छाड़ कैसे पकड़ें

ऐसा कोई तरीका नहीं जिससे आप निश्चिन्त हो जाएँ की सेकंड हैण्ड गाड़ी के ओडोमीटर से छेड़-छाड़ नहीं की गयी है. सबसे अच्छा तरीका है कार के सर्विस हिस्ट्री को देखना या कम से कम ये पता करना की कार की आम सर्विसिंग कहाँ हो रही थी. फिर आप सर्विस सेण्टर से पता कर सकते हैं की उस कार की आखिरी ओडोमीटर रीडिंग क्या थी. ये आपको ओडोमीटर से छेड़-छाड़ के बारे में अच्छी जानकारी देगा. फिर आप कार में लगे अगले सर्विस डेट का स्टीकर भी देख सकते हैं (ग्लव बॉक्स के अन्दर, डोर फ्रेम के अन्दर, या विंडस्क्रीन पर). फिर सर्विस स्टेशन का नाम/नम्बर पता कर उनसे संपर्क करें.

दूसरे चिन्ह हैं स्टीयरिंग व्हील, ब्रेक, क्लच पेडल, या गियर नॉब पर टूट-फूट और सीट कुशन वगैराह की हालत. जो कार्स 1 लाख किलोमीटर से ज़्यादा चली होंगी उनमें इन चीज़ों पर इस्तेमाल होने के निशान भी ज़रूर होंगे.

अगर आप भी कभी ओडोमीटर से छेड़-छाड़ का शिकार हुए हैं तो बाकी लोगों को इस दिक्कत से अवगत कराने के लिए अपने अनुभव को ज़रूर शेयर करें.