कैसे एक इंडियन ने गाड़ी के धुएँ को कलाकारी में तब्दील कर दिया है!

भारत के ज़्यादातर बड़े शहर प्रदूषण को कम करने से जूझ रहे है. जहाँ दिल्ली की बुरी तरह प्लान की गई ऑड-इवन रूल स्कीम नाकामयाब रही वहीं Anirudh Sharma ने इस समस्या का हल ढूंढ लिया है जो ना केवल प्रदुषण को कम करता है बल्कि वाहनों से पैदा होने वाले एमिशन को उपयोगी बनाता है.

MIT Media Labs के मुलाज़िम, Anirudh के इस यंत्र ने स्टैटिक इलेक्ट्रिसिटी के इस्तेमाल से मोमबत्ती के कालिख को इखट्टा किया था. Anirudh को एहसास हुआ कि ये जमा हुआ कालिख़ दरअसल Carbon Black है जो स्याही बनाने में काम आती है. Anirudh ने कहा, “मैं सोच में पड़ गया कि क्या ये प्रदूषण पिग्मेंटेशन में उपयोगी हो सकती है?” इसके बाद Anirudh ने अपने प्रिन्टर के कार्ट्रिज के लिए स्याही बनाने के इरादे से इस कालिख़ को इखट्टा करने के बाद इसमें रबिंग एलकोहॉल और तेल मिला दिया. ये स्याही कार्ट्रिज में दी जाने वाली स्याही से लगभग पूरी तरह मिलती जुलती थी.

इसके बाद Anirudh ने Nikhil मिलकर Graviky की शुरुआत की. दोनों ने मिलकर कालिख़ इखट्टा करने वाला एक यंत्र बनाया जिसे कार्स और डीजल जेनेटर्स के एग्जॉस्ट पर लगाया जा सकता है. इस यंत्र को Kaalink (Kaala +Ink) नाम दिया गया है. Graviky के अनुसार ये यंत्र 95% कालिख़ के साथ नुक्सानदायक कण के 2.5 से 10 माइक्रोमीटर्स इन डीएमटीर इखट्टा करता है.

ये डिवाइस एक इलेक्ट्रोस्टेटिक चार्ज के इस्तेमाल से एग्जॉस्ट से निकल रहे कणों को इखट्टा करता है. इस दौरान वायु और जल वाष्प जारी किए जाते हैं और इससे इंजन की परफॉरमेंस पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता. इस यंत्र को पूरी तरह भर जाने में लगभग दो हफ्ते लगते हैं. एकत्र किए गए कण कार्बन बैंक नामक कंटेनर में स्थानांतरित किए जाते हैं.

Anirudh कहना है कि ये प्रक्रिया काली कार्बन इंक बनाने का बहुत अच्छा तरीका है. शर्मा ने wired.com से कहा, “यहां तक ​​कि अगर दुनिया की ब्लैक स्याही आपूर्ति का केवल 15% एयर इंक से बदल दिया जाए, तो हम वायु प्रदूषण को बहुत अधिक मात्रा में काबू कर सकते हैं.”

वाया Wired और Graviky Labs on Youtube