इंडिया में सुपरकार खरीदते वक़्त ये 10 बातें जानना है ज़रूरी!

सुपरकार खरीदना हर शौक़ीन का सपना होता है. लेकिन, इंडिया में अगर आपको पूरी जानकारी ना हो तो सुपरकार खरीद लेना धोखे से कम नहीं होता. अगर आप इंडिया में सुपरकार पर आसमान छूने वाला टैक्स चुकाने में सक्षम हैं, आपको और भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. तो इंडिया में सुपरकार खरीदने के बारे में ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जो आपको कोई नहीं बताता? आइये हम बताते हैं!

बेमतलब की पब्लिसिटी

सड़कों पर, पैदल चलने वाले अक्सर इन दुर्लभ कार्स के साथ अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर खींचने के लिए मुस्कुराते हुए आते हैं. कभी-कभी, लोग भीड़ की तरह इकट्ठे होते हैं और ऐसा करते वक्त कार को ब्लॉक कर देते हैं. यहाँ तक कि ट्रैफिक पुलिस वालों को भी सुपरकार्स के साथ पोज़ मारते देखा गया है.

ग्राउंड क्लीयरेंस

भारत में स्पीड ब्रेकर्स विभिन्न आकारों के होते हैं. इनमें से अधिकतर स्पीड ब्रेकर्स अवैध हैं और निवासियों द्वारा वाहनों को धीमा करने के लिए बनाए जाते हैं. जहाँ नियमित कार्स धीमी हो सकती हैं और कभी-कभी बिना किसी बड़े परिणाम के उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर सकती हैं, एक सुपरकार ड्राइवर को ऐसे बंपर्स को पार करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है. स्पीड ब्रेकर्स को पार करते समय लो ग्राउंड क्लीयरेंस एक बड़ी समस्या बन सकती है. लापरवाही होने से परिणामस्वरूप नुकसान हो सकता है, जैसे अंडरबॉडी का टूट जाना या घिस जाना.

कहीं भी रिपेयरिंग

हम सभी एक भरोसेमंद मैकेनिक जानते हैं जो हमेशा त्वरित समस्या निवारण के लिए होता है. हालांकि, सुपरकार्स की जटिलता मालिकों को ऐसा करने की अनुमति नहीं देती है. यदि सुपरकार ख़राब हो जाती हैं तो सड़क के किनारे बैठे मैकेनिक का कोई फायदा नहीं होता है, जिसका मतलब है कि कम्पनी के सर्विस स्टेशन की मदद आने में घंटों लग सकते हैं.

विसिबिलिटी

इंडिया में लोग SUVs इसलिए खरीदते हैं ल्योंकी उसका सीटिंग पोजीशन ड्राईवर को आगे की सड़क का अच्छा व्यू देता है. इससे आप किसी भी अचानक आई बाधा को देख पायेंगे. लेकिन सुपरकार्स में ड्राईवर ज़मीन के बेहद करीब होता है, जिससे आपको कई चीज़ें आसानी से नहीं दिखतीं. कम हाइट के चलते सुपरकार्स SUVs के ड्राइवर्स को आसानी से नहीं दिखते जिससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है.

सर्विस का खर्चा

हालांकि सुपरकार्स कम चलती हैं, उन्हें अच्छे हालत में रखने के लिए साल में एक बार सर्विस करवाना पड़ता है. सुपरकार्स की आम सर्विसिंग भी काफी महंगी होती है और आपको आसानी से कम से कम 1 लाख रूपए का बिल मिल सकता है. अगर आप एक सुपरकार खरीदेंगे, उसे मेन्टेन करना बेहद महंगा हो सकता है.

सर्विसिंग का समय

अफसोस की बात है कि भारत में अभी तक कोई भी सुपरकार नहीं बनाई जाती है, और हाई टैक्स ये सुनिश्चित करता है कि इन कार्स के स्पेयर पार्ट्स का लगभग शून्य स्टॉक रह पाए. यदि एक सुपरकार का कोई पुर्ज़ा ख़राब हो जाता है या सुपरकार दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है, तो इन पुर्ज़ों को फैक्ट्री से स्पेशल आर्डर देकर इम्पोर्ट करवाना पड़ता है. ये प्रक्रिया लंबी और थकाऊ है और अक्सर सुपरकार्स को ठीक करने में महीनों लग जाते हैं.

बेहद महंगे टायर्स

सुपरकार्स में अधिकतम ग्रिप के लिए सॉफ्ट कंपाउंड टायर्स का इस्तेमाल किया जाता है. इन हाई पॉवर वाली कार्स में बेहद ज़्यादा ग्रिप वाले कार्स की ज़रुरत पड़ती है. आम टायर्स की तुलना में ये जल्दी घिसते भी हैं और अगर आप अक्सर ट्रैक जाते हैं तो ये प्रक्रिया और भी तेज़ होती है. कार के ओरिजिनल स्टॉक टायर्स ज़्यादा महंगे होते हैं और इंडिया में ऐसे ही टायर ढूंढना बेहद मुश्किल होता है. टायर्स को इंडिया में प्राइवेट तौर पर इम्पोर्ट नहीं कराया जा सकता और आपको ये काम डीलरशिप से करवाना होगा जो काफी महंगा हो सकता है.

अच्छा फ्यूल

सुपरकार्स पेचीदा इंजन के उपयोग से ईंधन को पॉवर में बदलती हैं. लो ग्रेड या खराब ईंधन का उपयोग इंजन को बंद और ख़राब करने का कारण बन सकता है। हम सब भारतीय पेट्रोल पम्पस पर मिलने वाले तेल की क्वॉलिटीज़ से अच्छी तरह परिचित हैं. सुपरकार मालिकों के लिए हाई क्वॉलिटी ईंधन स्टेशनों को ढूंढना महत्वपूर्ण है जहां वो हाई क्वॉलिटी ईंधन के साथ-साथ हाई ऑक्टेन नंबर वाला प्रीमियम ईंधन भी पा सकते हैं. जब कार में तेल की सूई ख़तम पर हो तो एक सुपरकार का मालिक होना आम कार के मालिक होने से कई गुना पेचीदा होता है.

कार के पूरे पॉवर का इस्तेमाल करना

अधिकांश भारतीय सड़कों पर यातायात के साथ अत्यधिक भीड़ मौजूद होती है. सुपरकार्स हाई-पॉवर्ड इंजनों के साथ आती हैं जिनका उपयोग ऐसी सड़कों पर ठीक से नहीं किया जा सकता है. अधिकांश सुपरकार्स 500 से अधिक बीएचपी, इंजन द्वारा संचालित होती हैं लेकिन उन्हें शायद ही कभी इस पॉवर को इस्तेमाल करने का मौका मिलता है. अफसोस की बात है कि, भारत में बहुत कम रेस ट्रैक्स हैं जिसके कारण इन पॉवरफुल कार्स का उचित उपयोग और भी ज़्यादा सीमित हो जाता है.

कार पार्किंग

सुपरकार्स जनता का बहुत ध्यान आकर्षित करती हैं. आप एक आम कार की तरह एक सुपरकार को बिना किसी चिन्ता के पार्क नहीं कर सकते हैं. ज़्यादातर उत्सुक जनता इस फैंसी कार को देखते ही इसमें ऊँगली करने लगती है और इस पर हल्की ख़रोंचें भी लगा सकती है. यही कारण है कि हम सार्वजनिक पार्किंग स्थल में ज़्यादा सुपरकार्स नहीं देखते हैं.